लेखक: Global Updates टीम | 📅 तारीख: 17 मई 2025
🔍 पृष्ठभूमि
हाल ही में भारत और अफगानिस्तान (तालिबान) के बीच एक अभूतपूर्व कूटनीतिक घटना घटी जब भारत के विदेश मंत्री ने तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताक़ी से फोन पर बातचीत की। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तालिबान को अभी तक दुनिया के किसी बड़े देश ने आधिकारिक मान्यता नहीं दी है।
लेकिन भारत का यह कदम सिर्फ एक “कॉल” नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीतिक चाल है — जो वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को पुनः परिभाषित कर रही है।
🌍 बदलते वैश्विक समीकरण
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अमेरिका-सीरिया का घटनाक्रम:
हाल ही में अमेरिका ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद पर लगे आतंकवाद के आरोपों को हटा दिया। यह वही नेता हैं जिन पर अमेरिका ने कभी $10 मिलियन का इनाम रखा था। यह संकेत है कि भू-राजनीति में अब “रुचि” और “रणनीति” पहले आती है, न कि नैतिकता। -
भारत की प्रतिक्रिया:
भारत ने भी इस बदलते रुख को ध्यान में रखते हुए अफगानिस्तान से संपर्क साधा। इस कूटनीतिक संवाद को लेकर माना जा रहा है कि यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित और समझदारी भरा कदम है।
भारत-तालिबान वार्ता: रणनीति के पीछे की सोच
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भारत लंबे समय तक तालिबान के संपर्क से दूर रहा क्योंकि तालिबान को एक आतंकवादी संगठन माना जाता था।
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लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है। तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो चुके हैं।
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पाकिस्तान, जो पहले तालिबान को भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना चाहता था, अब खुद उनके निशाने पर है।
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ऐसे में भारत के लिए यह “दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने” की रणनीति है।
🕵️♂️ ट्रंप और पाकिस्तान क्यों बौखलाए?
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डोनाल्ड ट्रंप तालिबान से नफरत करते हैं क्योंकि उन्हीं की वजह से अमेरिका को अफगानिस्तान से हटना पड़ा।
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पाकिस्तान को इस कूटनीतिक कॉल से सबसे ज़्यादा झटका लगा है, क्योंकि अब भारत उस शक्ति से संवाद कर रहा है जिसे पाकिस्तान ने कभी अपने मोहरे की तरह इस्तेमाल करना चाहा।
🧭 भारत की कूटनीतिक चाल: वर्चस्व की ओर कदम?
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भारत ने अब तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है, लेकिन संवाद की शुरुआत कर दी है।
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यह ‘नो-अलायंस, प्रैक्टिकल डिप्लोमेसी’ की मिसाल है, जहाँ भारत बिना किसी स्पष्ट समर्थन के, सिर्फ हितों की राजनीति कर रहा है।
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अफगानिस्तान की खनिज संपदा, भू-रणनीतिक स्थान और मध्य एशिया तक पहुँच भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है।
🤔 क्या यह भारत के लिए जोखिम भरा है?
बिलकुल। तालिबान का अतीत आतंकवाद से जुड़ा रहा है — विशेष रूप से 1999 कंधार हाईजैक जैसे मामलों में। लेकिन जैसे अमेरिका ने असद को क्लीन चिट दी, वैसे ही भारत भी भविष्य की संभावनाओं को देखकर पुराने पन्नों को पलट सकता है।
🔚 निष्कर्ष
भारत की यह नई अफगान नीति बताती है कि वह अब सिर्फ एक प्रतिक्रियात्मक ताकत नहीं, बल्कि रणनीतिक खिलाड़ी बन चुका है।
तालिबान से संवाद का मतलब यह नहीं कि भारत उन्हें स्वीकार कर रहा है, बल्कि इसका उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन और पाकिस्तान को कूटनीतिक मात देना है।
📌 मुख्य बिंदु (संक्षेप में):
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भारत ने पहली बार तालिबान के विदेश मंत्री से बातचीत की।
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तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते खराब हैं, भारत इसका फायदा उठा रहा है।
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यह बातचीत एक रणनीतिक संदेश है — अमेरिका, पाकिस्तान और दुनिया को।
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भारत अब व्यावहारिक भू-राजनीति की राह पर है, नैतिकता के साथ रणनीति का संतुलन।







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