राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 सवाल: क्या संवैधानिक अधिकारियों पर समयसीमा लागू हो सकती है?
दिनांक: 16 मई 2025
लेखक: Global Updates Team
🔍 पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला?
हाल ही में भारत के संवैधानिक ढांचे में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम देखने को मिला जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 प्रश्न पूछे। ये सवाल सीधे उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़े हैं, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपालों और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर समयबद्ध निर्णय लेने को कहा था।
यह फैसला विशेष रूप से तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आर.एन. रवि के बीच विवाद के बाद आया। राज्य सरकार ने आरोप लगाया था कि कई विधेयकों को राज्यपाल महीनों से रोके हुए थे और उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का फैसला: समयसीमा और डीम्ड असेंट
8 अप्रैल 2025 को सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
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राज्यपाल को विधेयक मिलने के 30 दिन के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा – या तो उसे मंजूरी दें, अस्वीकार करें, या राष्ट्रपति के पास भेजें।
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अगर वही विधेयक दोबारा विधानसभा से पारित होता है, तो राज्यपाल को एक महीने के भीतर उसे मंजूरी देनी होगी।
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अगर विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा गया है, तो राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
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अगर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो यह माना जाएगा कि विधेयक स्वीकृत हो गया है (Deemed Assent)।
यह पहली बार था जब संवैधानिक पदों – विशेषकर राज्यपाल और राष्ट्रपति – के लिए कानूनी समयसीमा तय की गई।
🇮🇳 राष्ट्रपति मुर्मू का कदम: संवैधानिक संकट या स्पष्टता की मांग?
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर संवैधानिक शंका जताते हुए 14 सवाल भेजे हैं। उन्होंने अनुच्छेद 143(1) का प्रयोग किया, जो उन्हें परामर्श हेतु सुप्रीम कोर्ट से राय मांगने का अधिकार देता है।
इनमें से प्रमुख प्रश्न ये हैं:
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क्या सुप्रीम कोर्ट संविधान में स्पष्ट रूप से तय नहीं की गई समयसीमा लागू कर सकता है?
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क्या न्यायपालिका कार्यपालिका की शक्तियों में हस्तक्षेप कर सकती है?
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अगर किसी संवैधानिक प्राधिकारी ने समयसीमा के भीतर निर्णय नहीं लिया, तो क्या “डीम्ड असेंट” का सिद्धांत लागू हो सकता है?
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क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे सहमति देने वाले प्राधिकारी पर बाध्यता लागू की जा सकती है?
🧭 अनुच्छेद 143 क्या है?
अनुच्छेद 143 (1) भारतीय संविधान में यह प्रावधान है कि जब राष्ट्रपति को लगता है कि कोई कानूनी या सार्वजनिक महत्व का प्रश्न है जिस पर सुप्रीम कोर्ट की राय आवश्यक है, तो वे परामर्श के लिए सुप्रीम कोर्ट से प्रश्न पूछ सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को इसका उत्तर देना आवश्यक नहीं है, परंतु अगर वह देता है, तो वह राष्ट्रपति के लिए मार्गदर्शक होता है।
🏛️ संविधान पीठ का गठन संभव
अब यह मामला नए मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के समक्ष रखा जाएगा। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर 5 या 7 जजों की संविधान पीठ गठित कर सकता है, क्योंकि यह सीधे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन से जुड़ा है।
💬 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राष्ट्रपति के इस कदम को “गैर-बीजेपी शासित राज्यों को कमजोर करने” की साजिश बताया है।
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वहीं संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक स्वस्थ संवैधानिक संवाद है जो भारतीय संघवाद को मजबूत करेगा।
📌 निष्कर्ष: क्या बदलेगा भविष्य?
राष्ट्रपति का यह सवाल पूछना एक संवैधानिक उदाहरण बन गया है। इससे स्पष्ट होता है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।
यदि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के प्रश्नों पर निर्णय देता है, तो यह भारत के संवैधानिक इतिहास में संवैधानिक अधिकारियों की भूमिका और समयसीमा को लेकर स्थायी दिशानिर्देश तय कर सकता है।
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