चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पर मंडराते खतरे पर एक नजर

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), जो चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा है, हाल के वर्षों में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह परियोजना चीन के झिंजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने के लिए बनाई गई है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना और आर्थिक विकास को गति देना है। हालांकि, इस परियोजना पर कई प्रकार के खतरे मंडरा रहे हैं, जो इसके भविष्य को अनिश्चित बना रहे हैं।
1. सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
CPEC के तहत कई परियोजनाएं पाकिस्तान के अशांत क्षेत्रों, जैसे बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा, से होकर गुजरती हैं। इन क्षेत्रों में चीनी कर्मचारियों और परियोजनाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं, जिससे चीन को अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ रही है।
2. राजनीतिक अस्थिरता
पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट ने CPEC की प्रगति को धीमा कर दिया है। पाकिस्तान में सरकारों के बदलते रुख और नीतियों ने परियोजना के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न की है।
3. अंतरराष्ट्रीय भू-रा3नीतिक दबाव
CPEC के कारण भारत और अमेरिका जैसे देशों ने इस परियोजना की आलोचना की है। भारत इसे अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानता है, क्योंकि यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है – वहीं, अमेरिका ने भी इसे चीन की विस्तारवादी नीति का हिस्सा बताया है।
4 . स्थानीय विरोध
बलूचिस्तान और सिंध प्रांत में स्थानीय समुदायों ने CPEC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं। उनका मानना है कि इस परियोजना से उनके संसाधनों का शोषण हो रहा है और उन्हें कोई लाभ नहीं मिल रहा।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पाकिस्तान में कई प्रकार के खतरों का सामना कर रहा है। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:
- सुरक्षा संबंधी खतरे
– बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे अशांत क्षेत्रों में CPEC परियोजनाओं और चीनी कर्मचारियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे समूह इन परियोजनाओं को निशाना बना रहे हैं, जिससे सुरक्षा की स्थिति गंभीर बनी हुई है।
बलूचिस्तान में सक्रिय बलूच स्वतंत्रता संगठनों ने CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के खिलाफ विरोध और हमले किए हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह परियोजना उनके क्षेत्रीय संसाधनों का शोषण करती है और स्थानीय समुदायों को कोई लाभ नहीं पहुंचाती। हालांकि, यह कहना कि वे इसे पूरी तरह “नष्ट” कर देंगे, एक जटिल और विवादास्पद विषय है।
CPEC को लेकर बलूच संगठनों की असहमति और विरोध ने परियोजना की प्रगति को धीमा जरूर किया है, लेकिन चीन और पाकिस्तान ने इसे जारी रखने के लिए सुरक्षा उपायों और कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत किया है
बलूच आंदोलन और उनकी CPEC विरोध की वजहें
बलूचिस्तान में सक्रिय बलूच स्वतंत्रता संगठनों का मानना है कि CPEC उनके संसाधनों का शोषण कर रहा है और उनके क्षेत्रीय स्वायत्तता पर खतरा डाल रहा है। इस विरोध के पीछे कई मुख्य कारण हैं:
- संसाधनों का शोषण:
बलूचिस्तान खनिज, प्राकृतिक गैस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है। बलूच आंदोलन के समर्थकों का आरोप है कि CPEC के तहत इन संसाधनों का दोहन किया जा रहा है और इसका लाभ पाकिस्तान की संघीय सरकार और बाहरी कंपनियों को मिल रहा है, जबकि स्थानीय समुदाय वंचित रह जाते हैं।
- न्याय और विकास का अभाव:
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन यह देश के सबसे उपेक्षित और पिछड़े इलाकों में गिना जाता है। CPEC परियोजनाओं से बलूच लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है, जैसे रोजगार या बुनियादी ढांचे का विकास।
- राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल:
बलूच आंदोलन के लिए यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उनकी राष्ट्रीय अस्मिता और स्वायत्तता से भी जुड़ा है। उनका मानना है कि CPEC परियोजना उनकी सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों को कमजोर करती है।
बलूच संगठनों के विरोध के प्रभाव
बलूच संगठनों द्वारा किए गए विरोध और हमलों का CPEC पर व्यापक प्रभाव पड़ा है:
– कई परियोजनाओं में देरी हुई है।
– चीनी और अन्य विदेशी कंपनियों के निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
– चीन को अपने नागरिकों और श्रमिकों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त संसाधन आवंटित करने पड़े हैं।
– पाकिस्तान की सरकार को इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है।
चीन और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
- सुरक्षा उपाय:
पाकिस्तान ने CPEC परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए विशेष बल तैनात किए हैं। इसके अलावा, चीन ने भी सुरक्षा में सुधार के लिए अतिरिक्त सहयोग का वादा किया है।
- स्थानीय स्तर पर समझौते:
बलूच समुदायों को परियोजनाओं का लाभ पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, अभी इन प्रयासों का अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा है।
- कूटनीतिक और आर्थिक दबाव:
चीन और पाकिस्तान बलूच संगठनों को दबाने के लिए कूटनीतिक और आर्थिक रणनीतियां अपना रहे हैं।
बलूच स्वतंत्रता संगठनों का CPEC को चुनौती देना एक जटिल समस्या है जो केवल बल प्रयोग से हल नहीं हो सकती। इसके लिए स्थानीय समुदायों के साथ पारदर्शी संवाद, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और राजनीतिक समाधान आवश्यक हैं।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के कारण भारत को निम्नलिखित प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ सकता है:
1. क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा
CPEC पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है, जिसे भारत अपने क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा मानता है। इस परियोजना से इन विवादित क्षेत्रों में चीन और पाकिस्तान की उपस्थिति मजबूत हो सकती है, जिससे भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
2. सामरिक (Strategic) खतरा
CPEC के माध्यम से पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य और आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। ग्वादर बंदरगाह पर चीन की मौजूदगी हिंद महासागर में भारत की नौसेना की गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता को बढ़ा सकती है, जिससे भारत की सामरिक स्थिति कमजोर हो सकती है।
3. सुरक्षा संबंधित खतरे
CPEC के तहत चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से बलूचिस्तान और अन्य अशांत क्षेत्रों में सैन्य बल बढ़ाने की संभावना है, जो क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ावा दे सकता है। यह भारत के लिए चिंता का विषय बनता है, क्योंकि इससे सीमा पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
4. आर्थिक प्रतिस्पर्धा
CPEC से चीन और पाकिस्तान के बीच व्यापार और कनेक्टिविटी में सुधार होगा, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक संतुलन भारत के खिलाफ झुक सकता है। ग्वादर बंदरगाह के विकास से चाबहार पोर्ट (ईरान) की रणनीतिक प्रासंगिकता कम हो सकती है, जिस पर भारत निवेश कर रहा है।
5. भू-राजनीतिक दबाव
CPEC को लेकर चीन और पाकिस्तान का बढ़ता गठजोड़ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। यह परियोजना भारत को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने का प्रयास हो सकती है, खासकर दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के देशों के साथ।
भारत की प्रतिक्रिया: उपाय और रणनीतियां
– भारत ने CPEC के खिलाफ कूटनीतिक स्तर पर विरोध जारी रखा है और इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चुनौती दी है।
– चाबहार बंदरगाह के विकास और अन्य वैकल्पिक संपर्क मार्गों पर काम करके क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा दिया जा रहा है।
– भारत ने क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ व्यापारिक संबंध गहरे करने के लिए प्रयास तेज किए हैं।
CPEC न केवल भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता पर असर डालता है, बल्कि इसे एक रणनीतिक और आर्थिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक नीतियों को सशक्त बनाए।













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